बाद फिर बिछड़ने के 
उमर भर की खामोशी बांध ली हैं होठों पर। 
 नहीं टूट कर रोये, नहीं कम जरा सोये. 
 नहीं हुई है बातें कम नहीं हुई है गम मेरे कम। 
दुख पुराना साथी है उसको चेहरे पर है क्यों लाना। 
 कल भी घर चलना था आज भी घर चलना है। 
आंसू भी तो रहते हैं बोझ बनकर आंखों पर। 
उमर भर की खामोशी बांध ली है होठों पर। 
उमर में हमारी जब तुम आओगे तो जानोगे। 
इश्क के फ़साने में तोहमतैन नहीं होती. 
कौन किसका दोषी है इसकी जगह नहीं होती। 
रोज टूटे सपनों को फिर से बनना होता है। 
दिल से आगे जाकर पेट को चुनना होता है। 
मोहब्बत में सिर्फ हमने ये शर्त रखी। 
भूले कल की आलमारी कोई नहीं खोलेगा। 
अगर याद आ भी जाए तो कोई कुछ ना बोलेगा। 
 हाथ रख कर जेब (जेब) पर आंसू भर कर पलकों पर। 
उमर भर की खामोशी बंद ली है होठों पर।